शतशत नमन उन शूरवीरों को।
शहादत की कीमत चुकानी तो पडे़गी।
आज सुबह भी वो जागी थी
अरूणोदय की लाली से
विरहणी की चूड़ी खनकी थी
प्रीत मिलन की खुशहाली से।
दो दिन ही तो शेष रहा था
छुट्टी में तुम घर आओगे।
मन के अरमां उछल रहे थे
पता नहीं क्या क्या लाओगे।
दूरभाष पर नहीं कहा दिल का
अब तो संग बैठ बतियाएंगे
पूजा की थाली में तुझ संग
इस घर का दीपक जलाएंगे।
गोधूलि बेला में ही आज क्यों
ये गहन अंधकार छाया है
हे रखवाले कितना सूनापन
ये इस जीवन में लाया है।
क्षितिज भी लालिमा त्याज्य
क्युं श्याम रंग अपनाया है
गहन कालिमा क्या सुहाग पर
ग्रहण बनकर मंडराया है।
आज रात्रि कैसे सोएगा देश
रक्षक चिरनिद्रा में सोया है।
भारत माँ का उर भी तो
लहु के अश्रु से भिगोया है।
हे दाता हे भाग्य विधाता
कितने सपूत हैं छीन लिए
कैसे करें अंतिम संस्कार
सशरीर भी तो नहीं दिए।
अब अरुणोदय की लाली भी
तप्त अंगारे बरसायेगी
रुको ठहरो ऐ भीरू कायर
जहन्नुम दर्शन करवाएगी।
– अंजना झा, फरीदाबाद,हरियाणा